Sunday, September 27, 2020
Bollywood

नहीं चला सनी का एक्शन और धरम की कॉमेडी, बोर करती है यमला-पगला फिर से

पहली फिल्म हिट थी, दूसरी फिल्म चली नहीं और तीसरी फिल्म ने भी बोर किया। फिल्म यमला पगला दीवाना की फ्रेंचाइजी वह कमाल दोबारा नहीं दोहरा पाई है। फिल्म में देओल फैमिली ने आयुर्वेद के इर्दगिर्द कहानी रची है। फिल्म थोड़ी ढीली रही, बॉलीवुड मसाला जिसकी उम्मीद थी, वह फिल्म में नजर नहीं आया है।

वैद्य की कहानी है YPD फिर से : जिसमें पुराण (सनी देओल) जो कि पंजाब से हैं एक ईमानदार आयुर्वेद डॉक्टर हैं। वे नज्ब छूकर ही लोगों की बीमारी बता देते हैं। पुराण के पास सभी बीमारियों के इलाज की एक दवाई है जिसका नाम वज्र कवच है। इस दवाई का फॉर्मूला पुराण के पूर्वजों से मिला है। पुराण नहीं चाहता कि इसे कोई दूसरा यूज करे। पुराण जानता है कि अगर ये फार्मूला दवाई कंपनियों के पास चला जाएगा तो ये गरीब जनता की पहुंच से बाहर हो जाएगा। पुराण एक शांत और धैर्यवान इंसान है। लेकिन गुस्सा आने पर अपनी डिफरेंट स्टाइल में घूंसे मार सकता है।

– पुराण का एक लोफर भाई है (बॉबी देओल) जिसका नाम काला है। उसकी उम्र 40 साल है। जिसकी ना तो शादी हुई है और ना ही उसके पास कोई रोजगार है। इसके साथ ही वह शराब पीने का आदी है। काला अक्सर पुराण की परेशानियों को बढ़ाने का काम करता है उनका किराएदार तेनंत परमार (धर्मेंद) जो सिर्फ 110 रुपए किराया देता है।

– इसके बाद गुजरात से चीकू (कीर्ति खरबंदा) इनकी लाइफ में आती हैं। इसके बाद सबकी लाइफ में कुछ बदलाव होते हैं। इसके बाद तीनों देओल अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट हो जाते हैं।

बाप-बेटों की तिकड़ी का जलवा कायम :आज भी सनी को पंच मारते हुए देखने में मजा आता है। जैसे सनी पंच मारते हैं वैसा कोई दूसरा नहीं कर सकता। फिल्म में धर्मेंद का चार्म देखने को मिला है। ऐसा लगता है कि उनके कैरेक्टर को दूसरे दो देओल के कैरेक्टर से ज्यादा इमेजिनेशन के साथ लिखा गया है।बॉबी देओल को काफी लंबा रोल मिला है लेकिन उनके डायलॉग रिपीट होते हैं जिनको सुनकर बोरियत ज्यादा महसूस होती है। फिल्म में वे एंटरटेनिंग नहीं लगते हैं।

– स्टोरी और स्क्रीनप्ले दोनों धीरज रतन ने लिखा है। कुछ सीन्स को छोड़कर कहानी उबाऊ और प्रिडिक्टेबल है। ज्यादातर डायलॉग रिपीट हुए हैं और बोरिंग भी हैं।

सनी के फैन हैं तो ही देखें फिल्म :डायरेक्टर नवानियत सिंह, देओल फैमिली के चार्म को भुनाने में असफल हुए हैं। हालांकि धर्मेन्द्र और रेखा के ओल्ड सुपरहिट सॉन्ग रफ्ता-रफ्ता का रीक्रिएशन एक बार फिर शानदार रहा है। फिल्म का फर्स्ट पार्ट अच्छा था लेकिन 7 साल बाद ये फिल्म बोरिंग, थकाऊ लगती है।

– एेसे में आप सिनेमा हॉल में बैठकर फिल्म के खत्म होने का इंतजार करते हैं। अगर आप सनी देओल के फैन हैं तो फिल्म को देख सकते हैं। बाकी फिल्म में कुछ भी नहीं है।

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